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पत्रकार समाज का आईना होते है। पत्रकार की दृष्टि और दृष्टिकोण में समाज का हित का नजर आता है। सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी जनता तक पहुंचाने का कार्य पत्रकार करते है। जिससे जनता को सरकारी योजनाओं का समुचित लाभ मिल सके। इसके अलावा पत्रकार सरकार का वास्तविक विपक्ष होते है। पत्रकारों की आलोचनात्मक लेखनी सोई हुई सरकारों की आंखे खोलने का कार्य करती है। लेकिन बदलते कंप्यूटर के दौर में पत्रकारों की कलम की धार कुंद पड़ने लगी है। लेकिन हरिद्वार के वरिष्ठ पत्रकार रतनमणि डोबाल उम्र के इस पड़ाव में भी सच्ची पत्रकारिता को जीवंत बनाए हुए है। उनकी मुखर आवाज जनहित की आवाज बुलंद कर रही है। इसी के चलते वह कई बार जन की आवाज के माध्यम से बेहद चौंकाने वाले खुलासे करते है। ऐसा ही उन्होंने अपने फेसबुक पेज पर जन की आवाज में किया।
आगे के शब्द श्री रतनमणि डोबाल जी के है
पहले डायरी, अब मोबाइल चैट
हम जब पत्रकार थे। अपराधिक घटना होती थी। पुलिस अधिकारी व थानेदार अपराध व अपराधी का विवरण देते हुए एक डायरी मिलने व कब्जे में लेने की बात अवश्य बताते थे।
दावा किया जाता था डायरी कई सफेदपोश व अपराधियों के नाम भी मिले हैं जिसकी मदद अपराधिक घटना में शामिल बदमाशों का पकड़ा जाएगा। लेकिन बरामद डायरी में किसके नाम हैं उनका अपराध से क्या संबंध है का पुलिस कभी खुलासा नही किया।
तब कोतवाली व थानेदार में एक सिपाही की ड्यूटी “वास्ते कार सरकार” दर्ज होती थी। जिसका काम, वसूली करना होता था। दरोगा तक वास्ते कार सरकार की ड्यूटी वाले सिपाही को सलाम करते थे। एक दिन मैंने मजाक मजाक में पूछ लिया तो वास्ते कार सरकार का मतलब समझ में आया। वास्ते कार सरकार का काम कोतवाली व थाने की दैनिक आवश्यकता की पूर्ति की करना होता था। डायरी का मालिक भी वही होता था। डायरी तेरा भी नाम है सुनते है नेता, व्यापारी, ठेकेदार जुआ, सट्टा, पार्किंग, हरिद्वार से दिल्ली, जयपुर की डग्गामार बसों के दलालों, होटलों, अवैध शराब, चरस आदि नशा बेचने वालों की हवा निकल जाती थी और बदले में वसूली अच्छी खासी। जिससे कोतवाली व थाने स्टाफ का साबुन, तेल, टूथपेस्ट, कच्छा, बनियान, खान-पान, पीने- खाने के शौकीन पत्रकारों का भी ध्यान रखा जाता था। यह बात मुझे इसलिए पता है कि एक बार होली के मौके 8 पीएम की दो बोतल लेकर एक दरोगा जी मेरे घर आ गए। मैंने उनका धन्यवाद किया। चाय पिलाई और दोनों बोतल विनम्रता पूर्वक लौटा दी कि मैं तो शराब पीता नही हूं बेचारे काफी शर्मिदा हुए।
मैंने लगभग 35 साल की पत्रकारिता पैदल ही की। एक कोतवाल साहब को तरस आया और वास्ते कार सरकार की ड्यूटी वाले सिपाही से एक नई साइकिल भिजवा दी। उसको भी साइकिल लेकर वापस जाना पड़ा। एक बार एक पत्रकार मित्र ने यह बताकर मुझे चौका दिया कि मेरे नाम से आबकारी विभाग से कोई शराब लाता है। उसने बताया कि जब मैंने आबकारी अधिकारी को बताया कि वह शराब पिता ही नही है, तब मेरे नाम की शराब आनी बंद हुई।
अब पुलिस को डायरी का मिलना बंद हो गया है। डायरी की जगह मोबाइल चैट ने ले ली है। मोबाइल से कब किससे कब और कितने समय बात हुई का पता चलता है। मोबाइल एक से अधिक भी मिल सकते हैं। जिससे सबसे अधिक हालत नेताओं खासकर सत्ताधारी पार्टी के नेताओ की होती है। जैसे भाजपा महिला मोर्चा की पूर्व जिलाध्यक्ष के मोबाइल चैट को लेकर कई भाजपा नेताओं के दस्त लगे हुए हैं।
वरिष्ठ पत्रकार का खुलासा— शराब की बोतल लेकर दारोगा पहुंचे घर




