न्यूज127, नई दिल्ली।
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (आईजीएनसीए), संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के कला निधि विभाग द्वारा डॉ. कपिला वात्स्यायन स्मृति व्याख्यान श्रृंखला के अंतर्गत “आत्मबोध से विश्वबोध” विषय पर एक विशेष व्याख्यान एवं वस्त्र प्रदर्शनी “अभिव्यक्ति” का आयोजन किया गया। यह प्रदर्शनी डॉ. कपिला वात्स्यायन संग्रह (सांस्कृतिक अभिलेखागार) पर आधारित है, जिसका संकलन सारिका अग्रवाल द्वारा किया गया।

कार्यक्रम की अध्यक्षता इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र न्यास के अध्यक्ष रामबहादुर राय ने की। मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात साहित्यकार एवं गुजरात साहित्य अकादमी के अध्यक्ष डॉ. भाग्येश वासुदेव झा ने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम का आधार वक्तव्य आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा प्रस्तुत किया गया, जबकि स्वागत एवं परिचय कला निधि विभागाध्यक्ष एवं डीन प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़ ने कराया।
डॉ. भाग्येश वासुदेव झा ने अपने संबोधन में कहा कि आज का वैश्विक संकट ‘आइडेंटिटी क्राइसिस’ का संकट है, जो किसी एक देश तक सीमित न होकर पूरे विश्व को प्रभावित कर रहा है। फ्रांसिस फुकुयामा, सैमुअल हंटिंगटन और शंकराचार्य के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आधुनिक विचारधाराएं समयबद्ध हैं, जबकि भारतीय चिंतन शाश्वत है। इज़राइल-हमास युद्ध, रूस-यूक्रेन संघर्ष और वैश्विक राजनीति के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि हर संघर्ष की जड़ पहचान का प्रश्न है।
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा दिए गए ‘आत्मनिर्भर भारत’ के आह्वान को भारतीय आत्मबोध का आधुनिक स्वरूप बताया। तकनीक के युग में मानसिक असंतुलन को सबसे बड़ा खतरा बताते हुए उन्होंने कहा कि इसका समाधान केवल तकनीक नहीं, बल्कि आत्मबोध है। भगवद्गीता और उपनिषदों के ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ और ‘तत्त्वमसि’ जैसे सूत्रों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आत्मबोध केवल ज्ञान नहीं, बल्कि अनुभूति है। शंकराचार्य के साधन-चतुष्टय को आत्मबोध की वैज्ञानिक प्रक्रिया बताते हुए उन्होंने कहा कि मोक्ष का अर्थ ‘Salvation’ नहीं, बल्कि भय, अहंकार और आसक्ति से मुक्ति है।
आईजीएनसीए के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने आधार वक्तव्य में डॉ. कपिला वात्स्यायन के संस्थान से गहरे जुड़ाव को स्मरण करते हुए कहा कि यह स्मृति व्याख्यान भारतीय सांस्कृतिक परंपरा की निरंतरता का सशक्त उदाहरण है। उन्होंने ‘अभिव्यक्ति’ वस्त्र प्रदर्शनी का उल्लेख करते हुए कहा कि वस्त्र केवल भौतिक वस्तु नहीं, बल्कि स्मृति, भाव और परंपरा के संवाहक होते हैं।
कार्यक्रम में स्वागत वक्तव्य देते हुए आईजीएनसीए के डीन प्रशासन प्रो. रमेश चंद्र गौड़ ने बताया कि यह स्मृति व्याख्यान पिछले छह वर्षों से निरंतर आयोजित किया जा रहा है। उन्होंने अध्यक्षता कर रहे रामबहादुर राय के मार्गदर्शन के लिए आभार व्यक्त किया और कहा कि ‘अभिव्यक्ति’ प्रदर्शनी 7 जनवरी तक दर्शकों के लिए खुली रहेगी। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि यह व्याख्यान और प्रदर्शनी शोध, विमर्श और सांस्कृतिक संवाद को नई दिशा देंगे।



