तप, त्याग और सनातन संस्कृति के संवाहक थे ब्रह्मलीन स्वामी चेतनानंद गिरि महाराज : श्रीमहंत रविन्द्र पुरी




Listen to this article


हरिद्वार।
तप, त्याग और ब्रह्मनिष्ठ जीवन की प्रतिमूर्ति ब्रह्मलीन स्वामी चेतनानंद गिरि महाराज की पुण्यतिथि बुधवार को श्रद्धा, भक्ति और गरिमामयी वातावरण में मनाई गई। संन्यास मार्ग स्थित श्री चेतनानंद गिरि आश्रम में आयोजित पुण्यतिथि समारोह में देश के विभिन्न प्रांतों से आए संत-महात्माओं, श्रद्धालुओं और भक्तों ने महाराजश्री को श्रद्धासुमन अर्पित कर उनके आध्यात्मिक योगदान का स्मरण किया।
ध्यक्षीय संबोधन में अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष एवं श्री पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी के सचिव श्रीमहंत रविन्द्र पुरी महाराज ने स्वामी चेतनानंद गिरि महाराज को ब्रह्मनिष्ठ, सरल और चरित्रवान संत बताया। उन्होंने कहा कि स्वामी जी का जीवन तप और त्याग की अनुपम मिसाल है, जो आने वाली पीढ़ियों के संतों एवं समाज के लिए सदैव प्रेरणास्रोत बना रहेगा। वे उदार हृदय, सनातन धर्म के सच्चे रक्षक और संत समाज के सशक्त मार्गदर्शक थे। उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन संतों की सेवा, सनातन संस्कृति के संरक्षण एवं उसके उत्थान के लिए समर्पित कर दिया।


श्रीमहंत रविन्द्र पुरी महाराज ने कहा कि स्वामी चेतनानंद गिरि महाराज ने आश्रम में गौ सेवा, ब्राह्मण सेवा और शिक्षा जैसे जनकल्याणकारी कार्यों की मजबूत नींव रखी। उन्हीं की प्रेरणा से उनकी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए वर्तमान में स्वामी रामानंद गिरि महाराज सनातन मूल्यों के संरक्षण एवं सेवा कार्यों को निरंतर गति प्रदान कर रहे हैं।
इस अवसर पर महामंडलेश्वर स्वामी सोमश्वरानंद गिरि महाराज ने अपने दादा गुरु स्वामी चेतनानंद गिरि महाराज को सत परंपरा और सिद्धांतों का पुरोधा बताते हुए भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि स्वामी जी का आध्यात्मिक मार्गदर्शन संत समाज के लिए अमूल्य धरोहर है।
आश्रम के परमाध्यक्ष महंत रामानंद गिरि एवं स्वामी कृष्णानंद गिरि ने कार्यक्रम में पधारे संतों, अतिथियों एवं श्रद्धालुओं का स्वागत किया। इससे पूर्व अखंड श्रीरामचरितमानस पाठ का आयोजन किया गया, जिसके उपरांत हवन, गुरु पूजन एवं रुद्राभिषेक संपन्न हुआ। कार्यक्रम के अंत में विशाल भंडारे का आयोजन किया गया, जिसमें सैकड़ों संतों एवं भक्तों ने प्रसाद ग्रहण किया। पुण्यतिथि समारोह श्रद्धा, सेवा और सनातन संस्कृति की भावना से ओतप्रोत रहा।