‘राजनीति का शोध केंद्र’ बना गुरूकुल कांगड़ी, चिट्ठी-चिट्ठी से सियासत में उबाल












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न्यूज 127
गुरूकुल कांगड़ी सम​विश्वविद्यालय राजनीति का शोध केंद्र बन गया है। संस्था की सियासत में रिटायर्ड कर्मचारी भी मैदान में मोर्चा संभाले हुए है। जबकि प्रमुख सियासी दल भाजपा और कांग्रेस ने एंट्री कर ली है। रानीपुर विधायक आदेश चौहान ने कर्मचारी संगठनों के साथ चर्चा की और उनके हितों की रक्षा करने का आश्वासन दिया। कांग्रेस के वरूण बालियान पहले से ही कर्मचारी संगठनों के साथ खड़े है। फिलहाल तो कर्मचारी संगठन धरना प्रदर्शन कर रहे है। इस प्रदर्शन को समर्थन देने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत का इंतजार कर रहे है।
आर्य प्र​तिनिधि सभा की ओर से प्रसिद्ध उद्योगपति डॉ एसके आर्य को गुरूकुल कांगड़ी का नया कुलाधिपति नियुक्त किया गया है। जिसके संबंध में आर्य प्रतिनिधि सभा के प्रतिनिधि विनय आर्य ने एक प्रतिनिधिमंडल के साथ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान से मुलाकात की और नव नियुक्त कुलाधिपति डॉ एसके आर्य की नियुक्ति की जानकारी दी। एसके आर्य के गुरूकुल कांगड़ी प्रांगण में 5 जुलाई का प्रस्तावित कार्यक्रम तय किया गया। जिसकी तैयारियों को लेकर विनय आर्य अपने सहयोगी राजेंद्र विद्यालंकार के साथ गुरूकुल कांगड़ी के सीनेट हॉल स्थित गेस्ट हाउस पहुंचे।
आपको बताते चले कि एसके आर्य की नियुक्ति की जानकारी इसलिए दी गई है कि आर्य प्रतिनिधि सभाओं की ओर से सियासत का पहला दांव यही से शुरू हुआ था। चूंकि डॉ एसके आर्य देश की प्रमुख हस्तियों में से एक है। उनका नाम, पद और प्रतिष्ठा गुरूकुल कांगड़ी से जुड़ेगी तो आर्य प्रतिनिधि सभाओं को बल मिलेगा।
एपीएस की रणनीति के मु​ताबिक सब कुछ ठीक चल रहा था। लेकिन गुरूकुल कांगड़ी की स्थिति की बात करें तो कर्मचारियों का एक बड़ा गुट रजिस्ट्रार सुनील कुमार के विरोध में खड़ा हुआ है। रजिस्ट्रार सुनील कुमार के खिलाफ सभी कर्मचारी लामबंद है। जब रजिस्ट्रार सुनील कुमार ने गेस्ट हाउस पहुंचे विनय आर्य और राजेंद्र विद्यालंकार के लिए कमरे खोले और बुके देकर स्वागत किया। कर्मचारी संगठनों ने विनय आर्य का विरोध किया तो रजिस्ट्रार सुनील कुमार ने पुलिस को सूचना दी। जिसके कारण विवाद और अधिक गहरा गया।
कर्मचारी यूनियन के नेताओं ने तत्कालीन कुलपति प्रो हेमलता के कार्यालय पहुंचकर रजिस्ट्रार सुनील कुमार पर कार्रवाई करने का दबाब बनाया। उसकी गतिविधियों को विश्वविद्यालय के विरोध में बताते हुए निलंबित करने की मांग की। लेकिन कुलपति हेमलता ने अपने विवेक का इस्तेमाल कर गुरुकुल विवि के हित में रजिस्ट्रार को मूल कैडर में भेजने का पत्र जारी कर दिया। रजिस्ट्रार सुनील कुमार ने इस पत्र को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़ते हुए अपनी ताकत का एहसास कराया। तभी तत्कालीन कुलपति हेमलता को कुलाधिपति डॉ एसके आर्य का पत्र आया और रजिस्ट्रार सुनील कुमार को उनके पद पर बने रहने के लिए आदेशित किया गया।
गुरूकुल कार्यालय में यह पत्र पहुंचते ही हंगामा हो गया। कर्मचारी संगठनों ने इस पत्र की फारेंसिक जांच कराने की मांग कर दी। दिल्ली की एक लैब में पत्र जांच के लिए भेज दिया गया।
तभी कुलाधिपति डॉ एसके आर्य का दूसरा पत्र कुलपति हेमलता को मूल कैडर में वापिस जाने के आदेश के साथ आया। वही दूसरी ओर कर्मचारी संगठन विनय आर्य के गुरूकुल कांगड़ी पहुंचने को लेकर आंदोलन की रणनीति बनाने लगे। कांग्रेस नेता वरूण बालियान, रिटायर्ड प्रोफेसर श्रवण कुमार कर्मचारियों के आंदोलन को अपना समर्थन दे चुके थे। मामला तूल पकड़ता जा रहा था। गुरूकुल का माहौल गरमा रहा था। सियासत शुरू हो चुकी थी। कर्मचारी संगठन जयचंदों की खोजबीन कर रहे थे। तभी आर्य प्रतिनिधि सभा ने दूसरा दांव कुलपति बदलने को लेकर चला। इतिहास विभाग के प्रोफेसर प्रभात कुमार सेंगर को कार्यवाहक कुलपति बनाने का आदेश कुलाधिपति एसके आर्य ने जारी कर दिया। प्रभात कुमार की ताजपोशी कराने और शांति व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस बल को बुलाया गया। हरिद्वार जिला प्रशासन और पुलिस की मौजूदगी तथा कर्मचारियों के तमाम विरोध को दरकिनार करते हुए गुरूकुल कांगड़ी में प्रभात कुमार सेंगर कुलपति की कुर्सी पर काबिज हो गए। जबकि प्रोफेसर हेमलता अपने विभाग के कक्ष में चली गई।
यहां यह बताते चले कि प्रोफेसर हेमलता को यूजीसी ने मोस्ट सीनियर प्रोफेसर होने के चलते कार्यवाहक कुलपति की तैनाती दी थी। तो ऐसे में यह बताना भी जरूरी है कि उनको कुलपति पद से हटाने के लिए यूजीसी की ओर से कोई आधिकारिक आदेश नही हुआ है। यूजीसी के मुताबिक प्रोफेसर हेमलता कुलपति है। जबकि एपीएस की ओर से प्रभात सेंगर कुलपति है।
जबकि ऐसा ही रजिस्ट्रार पद है। कुलपति हेमलता ने रजिस्ट्रार विपुल को बनाया। जबकि सुनील कुमार खुद रजिस्ट्रार होने का दावा कर रहे है। गुरूकुल कांगड़ी का यह प्रकरण अब शोध का विषय बन चुका है। संस्था के ​तमाम विवाद, यूजीसी के निर्देश, हाईकोर्ट के आदेश और कर्मचारी संगठनों और एपीएस की रणनीति। सभी की इस प्रकरण पर नजर है। एक तरफ संस्था के पदाधिकारियों की ताकत और दूसरी तरह स्थानीय नेताओं का वोट बैंक।