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अख़बार की स्याही से निकलकर सिल्वर स्क्रीन पर खौफ़ का पर्याय बनने वाले अभिनेता रामी रेड्डी का नाम भारतीय सिनेमा में हमेशा एक अलग पहचान के साथ लिया जाता है। एक ऐसा कलाकार, जिसने विलेन के किरदार को सिर्फ़ निभाया नहीं, बल्कि उसे अपनी दमदार शख़्सियत और संवाद अदायगी से अमर बना दिया। आज 01 जनवरी को रामी रेड्डी की जयंती पर उनका जीवन और सिनेमा सफ़र याद करना स्वाभाविक हो जाता है।
01 जनवरी 1959 को जन्मे रामी रेड्डी का जीवन आरंभ में किसी फ़िल्मी कहानी से कम नहीं था। युवा अवस्था में वे उस मोड़ पर खड़े थे, जहां भविष्य की दिशा स्पष्ट नहीं थी। इसी दौरान उन्हें पत्रकारिता को करियर के रूप में अपनाने की सलाह मिली। रामी रेड्डी ने हैदराबाद की प्रतिष्ठित उस्मानिया यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता की पढ़ाई पूरी की और एक उर्दू अख़बार में पत्रकार के रूप में काम शुरू किया।
पत्रकार बन जाने के बावजूद रामी रेड्डी की प्रभावशाली कद-काठी और रौबदार व्यक्तित्व उन्हें भीड़ से अलग पहचान दिलाता था। जब वे रिपोर्टिंग के लिए मैदान में उतरते, तो लोग अक्सर उन्हें किसी फ़िल्मी कलाकार की तरह देखते। यही व्यक्तित्व उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट बना। तेलुगू फ़िल्म अंकुसम के निर्माता ने उन्हें देखते ही एक अहम किरदार का प्रस्ताव दिया। अभिनय का सपना मन में पहले से मौजूद था, इसलिए रामी रेड्डी ने बिना देर किए इस अवसर को स्वीकार कर लिया।
अंकुसम रामी रेड्डी की पहली फ़िल्म बनी, जिसमें उन्होंने ‘स्पॉट नागा’ का किरदार निभाया। यह भूमिका इतनी लोकप्रिय हुई कि पहली ही फ़िल्म से वे साउथ इंडस्ट्री में चर्चा का केंद्र बन गए। इसके बाद उन्होंने कई फिल्मों में काम किया, लेकिन असली पहचान उन्हें चिरंजीवी अभिनीत सुपरहिट फ़िल्म जगाडेका वीरुडु अथिलेका सुंदरी से मिली। इस फ़िल्म में अमरीश पुरी और श्रीदेवी जैसे दिग्गज कलाकारों के बीच भी रामी रेड्डी का विलेन अवतार दर्शकों के ज़ेहन में बस गया। फ़िल्म का हिंदी संस्करण आदमी और अप्सरा के नाम से रिलीज़ हुआ, जहां हिंदी दर्शकों ने भी उनके अभिनय को खूब सराहा।
1990 में चिरंजीवी के साथ फ़िल्म प्रतिबंध ने उनकी लोकप्रियता को और ऊंचाई दी। इस सफलता ने रामी रेड्डी के लिए हिंदी फ़िल्म इंडस्ट्री के दरवाज़े खोल दिए। 1993 में आई फ़िल्म वक्त हमारा है में ‘कर्नल चिकारा’ के रूप में उनका खौफ़नाक अंदाज़ आज भी याद किया जाता है। लंबे कद, भारी आवाज़ और तीखे हाव-भाव के साथ वे हिंदी सिनेमा को एक नया विलेन दे चुके थे।
हालांकि रामी रेड्डी सिर्फ़ खलनायक तक सीमित नहीं रहे। उन्होंने कई फिल्मों में कॉमेडी भूमिकाएं भी निभाईं, जिन्हें दर्शकों ने उतना ही पसंद किया। उनके अभिनय की यही विविधता उन्हें खास बनाती थी।
एक दिलचस्प संयोग यह भी रहा कि अपने करियर की आख़िरी फ़िल्म गुरूवरम में रामी रेड्डी विलेन नहीं, बल्कि सांई बाबा के पवित्र किरदार में नज़र आए। यह तेलुगू फ़िल्म उनके अभिनय जीवन का एक भावनात्मक समापन साबित हुई।
जीवन के अंतिम वर्षों में रामी रेड्डी गंभीर रूप से बीमार रहने लगे। लिवर और किडनी से जुड़ी बीमारियों से जूझते हुए उन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया। उनका जाना सिनेमा जगत के लिए अपूरणीय क्षति थी।
रामी रेड्डी आज भले ही हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके निभाए किरदार, उनकी दहशत भरी मुस्कान और दमदार संवाद अदायगी उन्हें सदा ज़िंदा रखेगी। रामी रेड्डी जी को शत-शत नमन।
पत्रकारिता से परदे की ख़ौफ़नाक दुनिया तक: रामी का यादगार सफ़र



