मोबाइल फोन व लैपटॉप जैसे डिजिटल उपकरणों के कारण बढ़ा ‘स्क्रीन टाइम’ स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है और इसने बच्चों व युवाओं में मधुमेह के खतरे को और बढ़ा दिया है। विशेषज्ञों का कहना है कि अब मधुमेह सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रही, बल्कि बच्चों व युवाओं में भी तेजी से फैल रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि उपयोगकर्ता डिजिटल उपकरणों पर औसतन तीन से चार घंटे बिता रहे हैं, जिसके कारण शरीर में वसा की मात्रा बढ़ती है व इससे इंसुलिन रेजिस्टेंस (प्रतिरोध) बढ़ता है जो मधुमेह को जन्म देता है।
इंटरनेशनल डायबिटीज फाउंडेशन के आंकड़ों के मुताबिक 2024 में भारत में ( 20-79 आयु वर्ग के) लगभग 9 करोड़ लोग मधुमेह के शिकार थे जबकि 2000 में यह आंकड़ा लगभग तीन करोड़ था। अनुमान है कि वर्ष 2050 तक भारत में 16 करोड़ लोग मधुमेह की जद में आ जाएंगें।
भारत में लगभग 13.6 करोड़ लोग प्री-डायबिटिक हैं और यह दर बढ़ रही है।
मॉडल टाउन स्थित यथार्थ अस्पताल में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में विशेषज्ञ डॉक्टरों ने बताया कि अब मधुमेह सिर्फ बुजुर्गों की बीमारी नहीं रही, बल्कि युवाओं और महिलाओं में भी तेजी से फैल रही है।
कार्यक्रम में यथार्थ अस्पताल, मॉडल टाउन के वरिष्ठ विशेषज्ञ डॉ. राजीव गुप्ता (सीनियर डायरेक्टर एवं एचओडी, इंटरनल मेडिसिन), डॉ. संजय गुप्ता (सीनियर डायरेक्टर, इंटरनल मेडिसिन) और डॉ. अनिल गोंबर (सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन एवं डायबेटोलॉजिस्ट) ने हाल के वर्षों में मधुमेह के बढ़ते मामलों और इसके कारणों पर गहराई से जानकारी दी।
दिल्ली के मॉडल टाउन स्थित यथार्थ अस्पताल के इंटरनल मेडिसन विभाग के प्रमुख डॉ. राजीव गुप्ता ने बताया कि लगभग 90 प्रतिशत मधुमेह के मामले ‘लाइफस्टाइल’ से जुड़े हैं। उन्होंने कहा, ”लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बैठे रहना, व्यायाम की कमी और असंतुलित आहार इंसुलिन की क्षमता को कमजोर करते हैं। अब यह असर बच्चों में भी दिख रहा है, जिनमें तीन से चार घंटे से ज़्यादा स्क्रीन टाइम होने पर मोटापा और इंसुलिन रेसिस्टेंस तेजी से बढ़ रहा है।”
उन्होंने बताया कि रोज ओपीडी में आने वाले लगभग 40% मरीज डायबिटिक हैं, जिनकी उम्र ज़्यादातर 40 से 60 वर्ष के बीच है।यंग एडल्ट (युवा वर्ग) लगभग 5 से 7फीसदी हैं। बच्चों की संख्या लगभग 1% है।
लैंसेट के एक अध्ययन के अनुसार, भारत में लगभग 15.3फीसदी आबादी प्रीडायबिटिक है। आईसीएमआर के एक विश्लेषण के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में मधुमेह के मरीजों की संख्या में 44 फीसदी की वृद्धि हुई है, जिससे प्रीडायबिटिक मामले भी बढ़ रहे हैं।
यथार्थ अस्पताल के वरिष्ठ निदेशक डॉ. संजय गुप्ता ने बताया कि भारत में अब 25 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में भी टाइप-2 मधुमेह के मामले सामने आ रहे हैं। उन्होंने बताया कि एक अध्ययन में पाया गया कि भारत में किशोरों में प्री-डायबटीज/डायबटीज का प्रतिशत 12.3, और लड़कियों में 8.4% था। उन्होंने यह भी कहा कि मधुमेह अक्सर बिना लक्षणों के शरीर को नुकसान पहुंचाता है, इसलिए नियमित स्वास्थ्य जांच बेहद ज़रूरी है।
यथार्थ अस्पताल के सीनियर कंसल्टेंट, इंटरनल मेडिसिन एवं डायबेटोलॉजिस्ट डॉ. अनिल गोंबर ने बताया कि लंबे समय तक प्रदूषण के असर के वजह से मधुमेह का खतरा लगभग 22 प्रतिशत तक बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में जहां वायु-प्रदूषण का स्तर बहुत ऊंचा है वहां मधुमेह के लिए यह एक महत्त्वपूर्ण जोखिम-कारक है।
उन्होंने कहा कि एक अध्ययन में पाया गया कि सिर्फ एक महीने तक उच्च पीएम2.5 के संपर्क में रहने से भी ब्लड ग्लूकोज़ (फास्टिंग ग्लूकोज) का स्तर बढ़ सकता है — और एक साल या उससे अधिक ऐसे वातावरण में रहने से मधुमेह का जोखिम और ज्यादा हो जाता है।
डॉ गोंबर ने कहा, ” प्रदूषण के कारण वातावरण में मौजूद पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म तत्व शरीर में सूजन और ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस पैदा करते हैं, जिससे इंसुलिन सही ढंग से काम नहीं कर पाता। कोविड के दौरान यह स्थिति और गंभीर हुई, क्योंकि संक्रमण के बाद नए मधुमेह मामलों में काफी बढ़ोतरी देखी गई।”
उन्होंने कहा ”सुस्त जीवनशैली, बढ़ते वजन की समस्या, लंबे समय तक स्क्रीन के सामने रहना और शारीरिक गतिविधि में कमी अब युवाओं को भी मधुमेह की ओर धकेल रही है।”
विशेषज्ञों का कहना है कि स्वस्थ जीवनशैली, आहार और व्यायाम के जरिये न केवल मधुमेह को रोका जा सकता है, बल्कि इसे नियंत्रित भी किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भोजन में चीनी, मिठाई और जंक फूड कम करें,हरी सब्जियां, फल, साबुत अनाज को शामिल करें।
उन्होंने कहा कि लंबे समय तक बैठे न रहे और हर रोज कम से कम 30–45 मिनट पैदल चलें या योग करें। कम से कम 7–8 घंटे की नींद लें व धूम्रपान और शराब से दूर रहें और नियमित जांच कराएं।
स्क्रीन टाइम’ दे रहा है मधुमेह को दावत



