अहमदाबाद।
गुजरात हाईकोर्ट ने वैवाहिक क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए पति को सभी आरोपों से बरी कर दिया है। कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि पत्नी के मायके में रात रुकने को लेकर हुए विवाद में पति द्वारा एक बार थप्पड़ मारना अपने आप में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं माना जा सकता।
मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को पलटते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि पति का व्यवहार इतना गंभीर या लगातार था, जिससे पत्नी को आत्महत्या के लिए मजबूर होना पड़ा हो। कोर्ट ने कहा कि किसी एक isolated घटना को, बिना अन्य ठोस साक्ष्यों के, वैवाहिक क्रूरता का आधार नहीं बनाया जा सकता।
इससे पहले निचली अदालत ने पति को दोषी मानते हुए एक वर्ष की सजा सुनाई थी। आरोप था कि पति द्वारा कथित तौर पर थप्पड़ मारने और व्यवहार से आहत होकर पत्नी ने आत्महत्या कर ली। हालांकि, हाईकोर्ट ने साक्ष्यों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए पाया कि घटना और आत्महत्या के बीच प्रत्यक्ष और स्पष्ट कारण-परिणाम संबंध स्थापित नहीं हो पाया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी कहा कि वैवाहिक जीवन में उत्पन्न सामान्य विवादों और गंभीर क्रूरता के मामलों के बीच अंतर करना आवश्यक है। केवल एक बार थप्पड़ मारने की घटना, जब तक उसके पीछे लगातार उत्पीड़न या गंभीर मानसिक प्रताड़ना के प्रमाण न हों, कानूनन ‘क्रूरता’ की परिभाषा में स्वतः नहीं आती।
पत्नी को एक बार थप्पड़ मारना ‘क्रूरता’ नहीं, पति बरी






