गंगा-यमुना को ‘जीवित माँ’ का दर्जा देने की मांग तेज़, विशेषज्ञों ने कहा – ‘नदी नहीं, माँ हैं ये’








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न्यूज127, नई दिल्ली
राष्ट्रीय सेवा समिति के तत्वावधान में सोमवार को राजधानी दिल्ली में “गंगा-यमुना को ‘जीवित माँ’ का कानूनी दर्जा देना: क्यों और कैसे?” विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में देश के विभिन्न हिस्सों से आए पर्यावरणविदों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और चिंतकों ने भाग लिया और नदियों को केवल जलधारा नहीं, बल्कि संवेदनशील जीवित इकाई मानने की पुरज़ोर वकालत की।

इस संगोष्ठी में मातृसदन के परमपूज्य स्वामी शिवानंद जी महाराज, ‘जलपुरुष’ डॉ. राजेन्द्र सिंह, अरुण तिवारी, डॉ. प्ररूण कुमार तिवारी, पर्यावरणविद् डॉ. इंदिरा खुराना, योगी आनंद, रमेश जोशी, प्रकाश झा सहित अनेक गणमान्य वक्ता उपस्थित रहे।

गंगा-यमुना की हालत पर जताई चिंता
वक्ताओं ने कहा कि भारत में गंगा और यमुना को सदियों से ‘माँ’ का दर्जा प्राप्त है, परंतु आज इनकी हालत अत्यंत दयनीय है। लगातार बढ़ते प्रदूषण, अवैध खनन, और तटों पर हो रहे अतिक्रमण ने इन नदियों के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया है।

डॉ. राजेन्द्र सिंह ने कहा, “गंगा-यमुना को केवल प्राकृतिक संसाधन मानने की भूल ने हमें इस स्थिति तक पहुंचाया है। अब समय है कि हम इन्हें संवैधानिक रूप से जीवित मान्यता दें।”

दुनिया से मिला उदाहरण
परिचर्चा में यह तथ्य भी सामने आया कि न्यूजीलैंड की वांगानुई नदी, कोलंबिया की अत्रातो नदी, कनाडा की मैग्पी नदी और बांग्लादेश की तुराग नदी को पहले ही जीवित इकाई का दर्जा दिया जा चुका है। भारत में भी 2017 में उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने गंगा और यमुना को यह दर्जा दिया था, लेकिन बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने इस आदेश पर रोक लगा दी।

सभा के प्रमुख प्रस्ताव
संगोष्ठी के अंत में सर्वसम्मति से निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किए गए:
गंगा और यमुना को ‘जीवित माँ’ का कानूनी दर्जा दिया जाए।
इनके लिए ‘अभिभावक प्रतिनिधियों’ की नियुक्ति की जाए जो न्यायालय में इनकी तरफ से पक्ष रखें।
संसद में ‘गंगा-यमुना जीवनाधिकार विधेयक’ लाया जाए।
प्रदूषण व अवैध खनन से वसूली गई राशि से विशेष संरक्षण कोष बनाया जाए।
नदियों की निगरानी और संरक्षण के लिए स्थानीय स्तर पर ‘नदी पंचायतों’ का गठन किया जाए।

‘माँ का सम्मान चाहिए, नारा नहीं’

स्वामी शिवानंद जी ने कहा, “जब तक गंगा-यमुना को विधिक माँ का दर्जा नहीं मिलेगा, तब तक संरक्षण की बातें सिर्फ भाषणों तक सीमित रहेंगी। माँ का सम्मान चाहिए, सिर्फ नारा नहीं।”

संविधानिक दायित्व की बात
कार्यक्रम के समापन पर वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि नदियों की रक्षा करना केवल सांस्कृतिक उत्तरदायित्व नहीं, बल्कि संवैधानिक कर्तव्य भी है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो अगली पीढ़ियों को इसका भारी खामियाज़ा भुगतना पड़ेगा।