रुद्रप्रयाग/ चमोली, संदीप बर्तवाल
तमिलनाडु और उत्तराखंड के बीच आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने वाली एक ऐतिहासिक पहल के तहत भगवान मुरुगन (कार्तिकेय स्वामी) की दुर्लभ पंचधातु प्रतिमा कार्तिक स्वामी मंदिर में भेंट की गई। यह पहल तमिलनाडु के भगवान मुरुगन के परम भक्त जेएसके गोपी द्वारा की गई, जिन्होंने इसे सनातन संस्कृति, भक्ति और राष्ट्रीय एकता का दिव्य प्रतीक बताया।
जेएसके गोपी लंबे समय से भारत एवं विश्वभर में भगवान मुरुगन की पूजा परंपराओं और उनके ऐतिहासिक संबंधों पर आध्यात्मिक एवं शोध कार्य कर रहे हैं। इसी शोध के दौरान उन्हें यह ज्ञात हुआ कि उत्तराखंड का प्राचीन कार्तिक स्वामी मंदिर भगवान कार्तिकेय से जुड़ा अत्यंत प्राचीन और आध्यात्मिक रूप से महत्वपूर्ण धाम माना जाता है। स्थानीय मान्यताओं के अनुसार हिमालय स्थित यह मंदिर तमिलनाडु की मुरुगन परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है।

इस दिव्य संबंध से भाव-विभोर होकर जेएसके गोपी ने भगवान मुरुगन की आराधना एवं ध्यान के दौरान प्राप्त आध्यात्मिक प्रेरणा के बाद कार्तिक स्वामी मंदिर में दुर्लभ पंचधातु की भगवान मुरुगन प्रतिमा भेंट की। यह प्रतिमा केवल धार्मिक भेंट नहीं, बल्कि उत्तराखंड और तमिलनाडु के बीच सांस्कृतिक एकता और आध्यात्मिक समरसता का प्रतीक मानी जा रही है।
विशेष बात यह रही कि यह प्रतिमा भगवान मुरुगन के पारंपरिक “वेल” (भाला) धारण किए स्वरूप में नहीं, बल्कि दुर्लभ “आशीर्वाद मुद्रा” (आशीर्वादा कोलम) में स्थापित की गई है, जो करुणा, कृपा और मानव कल्याण का प्रतीक मानी जाती है।
इस पहल के दौरान जेएसके गोपी की मुलाकात उत्तराखंड के वरिष्ठ आईएएस अधिकारी सी रविशंकर से हुई, जो कार्तिक स्वामी मंदिर के विकास एवं उत्तराखंड-तमिलनाडु सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। वही कार्तिकेय मंदिर समिति के अध्यक्ष विक्रम नेगी द्वारा प्रतिमा भेंट की इस पहल का स्वागत श्रद्धा और उत्साह के साथ किया गया।
वही यह पहल उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के उस व्यापक विजन को भी दर्शाती है, जिसके तहत राज्य सरकार भारत की प्राचीन आध्यात्मिक विरासत को संरक्षित करने और विभिन्न राज्यों के बीच सांस्कृतिक संबंधों को मजबूत करने के प्रयास कर रही है।
मान्यता है कि भगवान मुरुगन ने हिमालय स्थित कार्तिक स्वामी धाम से तमिलनाडु के प्रसिद्ध पलानी मुरुगन मंदिर तक आध्यात्मिक यात्रा की थी। अब इस विशेष आयोजन के माध्यम से भगवान मुरुगन प्रतीकात्मक रूप से पुनः तमिलनाडु से उत्तराखंड लौटे हैं, जिसने दो प्राचीन आध्यात्मिक परंपराओं को एक सूत्र में जोड़ने का कार्य किया है।




