तीन सौ साल पुरानी विरासत पर संकट: अल्मोड़ा का टम्टा बाजार खो रहा अपनी पहचान








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अल्मोड़ा (उत्तराखंड)
कभी तांबे की खनखनाहट और कारीगरों की मेहनत से गूंजने वाला अल्मोड़ा का ऐतिहासिक टम्टा बाजार आज खामोशी की चादर ओढ़े नजर आ रहा है। यह वही बाजार है, जहां कभी गलियों में कदम रखते ही हथौड़ों की ताल सुनाई देती थी और हर दुकान पर ताजे, चमचमाते तांबे के बर्तन बनते दिखते थे। तांबे के बर्तनों की खनखनाहट और कारीगरों की मेहनत से गुलजार रहने वाला यह बाजार अब धीरे—धीरे सन्नाटे में तब्दील हो रहा है। और यहां की तीन सौ साल पुरानी विरासत पर संकट के बादल मंडराने लगे है।

तीन सौ साल पुरानी परंपरा
टम्टा बाजार का इतिहास तीन सौ साल से भी अधिक पुराना बताया जाता है। कुमाऊं क्षेत्र में तांबे के बर्तन बनाने की कला को जीवित रखने में इस बाजार की अहम भूमिका रही है। यहां की टम्टा जाति पीढ़ी दर पीढ़ी इस हुनर को संजोए हुए थी।

लकड़ी की भट्टियों में तपता तांबा, हाथों से उसे आकार देते कारीगर और बाजार में बर्तनों की खनक — यह सब इस क्षेत्र की पहचान हुआ करता था।

मशीनों ने छीनी कारीगरों की रोजी
समय के साथ बाजार की तस्वीर तेजी से बदली है। अब मशीनों से बने सस्ते बर्तन बाजार में आसानी से उपलब्ध हैं, जिससे पारंपरिक कारीगरों की मांग घटती जा रही है।

सस्ते और टिकाऊ विकल्पों ने ग्राहकों का रुझान बदल दिया है
हस्तनिर्मित तांबे के बर्तन महंगे पड़ते हैं। नई पीढ़ी इस पेशे से दूरी बना रही है। इन कारणों से टम्टा कारीगरों के सामने आज रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है।

रौनक से सन्नाटे तक का सफर
जो बाजार कभी भीड़ और आवाजों से गुलजार रहता था, वहां अब सन्नाटा पसरा है। कई दुकानें बंद हो चुकी हैं और जो बची हैं, वहां भी ग्राहकों की कमी साफ दिखती है। कारीगर बताते हैं कि पहले दिनभर काम करने के बाद भी ऑर्डर पूरे नहीं होते थे, लेकिन अब पूरा दिन गुजर जाता है और एक-दो ग्राहक ही आते हैं।

पहचान बचाने की जंग
टम्टा समुदाय के ये हुनरमंद कारीगर आज अपने अस्तित्व और पहचान के लिए संघर्ष कर रहे हैं। उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी तांबे के बर्तन बनाने में लगा दी, लेकिन बदलते बाजार में उनका हुनर पीछे छूटता जा रहा है।
पारंपरिक कला को संरक्षण की जरूरत, सरकारी और सामाजिक सहयोग जरूरी, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देने की मांग, जरूरत है संरक्षण और संवर्धन की

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इस कला को संरक्षण नहीं मिला, तो आने वाली पीढ़ियां केवल किताबों में ही टम्टा बाजार का नाम पढ़ेंगी।
जिलाधिकारी अंशुल सिंह ने “वोकल फॉर लोकल” की मुहिम और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने की कवायद तेजी से शुरू कर दी है। स्थानीय स्तर पर रोजगार के माध्यमों को सृजित किया जा रहा है। कुमाऊं की सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखने के प्रयास पर संजीदगी दिखाई दे रही है। लेकिन जरूरत है कि समाज के लोग मिलकर इस अनमोल धरोहर को बचाने के लिए आगे आएं — ताकि फिर से इन गलियों में तांबे की खनखनाहट गूंज सके।