डीएवी पब्लिक स्कूल में हरेला महोत्सव की धूम, पर्यावरण और लोक संस्कृति का अनूठा संगम








Listen to this article

न्यूज 127, देहरादून।
डीएवी पब्लिक स्कूल, डिफेंस कॉलोनी में उत्तराखंड का लोकपर्व ‘हरेला’ पारंपरिक उल्लास, सांस्कृतिक गरिमा और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के साथ उत्साहपूर्वक मनाया गया। हरेला महोत्सव के अंतर्गत आयोजित विविध सांस्कृतिक एवं शैक्षिक गतिविधियों ने विद्यार्थियों को उत्तराखंड की समृद्ध लोकसंस्कृति, स्थानीय बोली-भाषाओं, पारंपरिक खान-पान और प्रकृति संरक्षण से जोड़ते हुए अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का प्रेरक संदेश दिया।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. माधुरी बड़तवाल, विशिष्ट अतिथि युवा साहित्यकार एवं एफ.आर.आई.,देहरादून के शोधार्थी सुधान केंतुरा तथा विद्यालय की प्रधानाचार्या शालिनी समाधिया द्वारा दीप प्रज्वलित कर किया गया। दीप प्रज्वलन के उपरांत कक्षा तृतीय एवं चतुर्थ के छात्र-छात्राओं ने हरेला पर्व पर आधारित लोकगीत, लोकनृत्य, कविता एवं संदेशपरक सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति को सजीव रूप में मंच पर प्रस्तुत किया।

कार्यक्रम का विशेष आकर्षण विद्यार्थियों की स्थानीय बोली-भाषाओं में दी गई प्रस्तुतियाँ रहीं। गढ़वाली, कुमाऊँनी एवं जौनसारी भाषा में विद्यार्थियों ने आत्मविश्वास के साथ हरेला पर्व का महत्व बताया तथा प्योंली, बुरांश, काफल, मोनाल, सरयू, रामगंगा, कोसी तथा उत्तराखंड की अन्य प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों का परिचय अपनी मातृभाषा में देकर उपस्थित अतिथियों का मन मोह लिया। विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों ने उत्तराखंड की सांस्कृतिक विविधता और भाषाई समृद्धि को प्रभावशाली ढंग से मंच पर जीवंत कर दिया। इसके उपरांत विद्यालय परिसर में वृक्षारोपण कर ‘हरित उत्तराखंड–समृद्ध उत्तराखंड’ का संदेश दिया गया।

हरेला महोत्सव के अंतर्गत “उत्तराखंड के पारंपरिक पेय पदार्थों का आधुनिक मॉकटेल रूपांतरण” विषय पर एक अभिनव प्रतियोगिता का आयोजन किया गया। कक्षा सप्तम के विद्यार्थियों ने उत्तराखंड के पारंपरिक पेय पदार्थों को आधुनिक मॉकटेल के रूप में आकर्षक एवं कलात्मक ढंग से प्रस्तुत किया। प्रतिभागियों ने अपने-अपने पेय पदार्थों की सामग्री, पोषण मूल्य, औषधीय गुण, स्वास्थ्य लाभ एवं सांस्कृतिक महत्त्व पर प्रभावशाली वक्तव्य प्रस्तुत किए। कक्षा गतिविधि के रूप में विद्यार्थियों ने यह भी बताया कि उत्तराखंड की पारंपरिक पेय संस्कृति किस प्रकार स्थानीय जीवनशैली, प्राकृतिक संसाधनों और स्वस्थ जीवन का अभिन्न हिस्सा रही है। विद्यार्थियों की शोधपरक सोच, रचनात्मकता, आत्मविश्वास एवं प्रभावशाली प्रस्तुति ने सभी उपस्थित अतिथियों का ध्यान आकर्षित किया।

प्रतियोगिता का मूल्यांकन नीता जोशी एवं सीमा नंदराजोग ने किया। निर्णायकों ने प्रतिभागियों के पेय पदार्थों का स्वाद, गुणवत्ता, पोषण मूल्य, नवीनता, प्रस्तुतीकरण एवं विषय की समझ के आधार पर निष्पक्ष मूल्यांकन किया। उन्होंने विद्यार्थियों के प्रयासों की सराहना करते हुए उन्हें उत्तराखंड की पारंपरिक खाद्य एवं पेय संस्कृति के संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर प्रयासरत रहने की प्रेरणा दी। प्रतियोगिता में कक्षा सप्तम ‘अ’ ने प्रथम, कक्षा सप्तम ‘स’ ने द्वितीय, कक्षा सप्तम ‘द’ ने तृतीय तथा कक्षा सप्तम ‘ब’ ने चतुर्थ स्थान प्राप्त किया।

अपने प्रेरक संबोधन में मुख्य अतिथि पद्मश्री डॉ. माधुरी बड़तवाल ने कहा कि हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, हरियाली, समृद्धि और पर्यावरण संरक्षण का जीवन-दर्शन है उन्होंने विद्यार्थियों से अधिकाधिक वृक्षारोपण करने, पर्यावरण संरक्षण को अपना दायित्व मानने तथा अपनी संस्कृति और लोकपरंपराओं पर गर्व करने का आह्वान किया। विशिष्ट अतिथि सुधान केंतुरा ने विद्यार्थियों को उत्तराखंड की स्थानीय बोली-भाषाओं, लोकसाहित्य और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि मातृभाषा और लोकभाषाएँ हमारी सांस्कृतिक पहचान की आत्मा हैं। नई पीढ़ी यदि अपनी भाषा, लोकगीतों, लोककथाओं और लोकपरंपराओं से जुड़ी रहेगी, तभी उत्तराखंड की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत सुरक्षित और जीवंत बनी रहेगी।

अध्यक्षीय उद्बोधन में विद्यालय की प्रधानाचार्या शालिनी समाधिया ने कहा कि हरेला केवल एक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति हमारी कृतज्ञता, स्वस्थ जीवनशैली, पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक मूल्यों कोजीवन में उतारने की प्रेरणा है। उन्होंने विद्यार्थियों से अधिक से अधिक वृक्ष लगाने, उनकी नियमित देखभाल करने, स्थानीय खाद्य एवं पेय परंपराओं को अपनाने तथा उत्तराखंड की लोकसंस्कृति, मातृभाषा और परंपराओं को नई पीढ़ी तक पहुँचाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि प्रकृति की रक्षा और संस्कृति का संरक्षण ही आने वाली पीढ़ियों के उज्ज्वल, स्वस्थ और समृद्ध भविष्य की सबसे अमूल्य धरोहर है।

कार्यक्रम का समापन पर्यावरण संरक्षण, वृक्षारोपण, स्थानीय बोली-भाषाओं के संवर्धन तथा उत्तराखंड की समृद्ध लोक एवं सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ।