जन आंदोलनों में नारों की भूमिका और उनका अप्रत्याशित प्रभाव: विजय मान








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न्यूज 127,
समाज जीवन में समय-समय पर अनेक प्रकार के आंदोलन चलते रहते हैं। इन आंदोलनों को जन-जन तक पहुँचाने और लोगों को एक सूत्र में बाँधने का सबसे प्रभावी माध्यम नारे होते हैं। एक सशक्त नारा आंदोलन की भावना को कुछ शब्दों में व्यक्त कर देता है और लोगों के मन पर गहरी छाप छोड़ता है।
कई नारे आंदोलन के रणनीतिकारों, लेखकों या प्रचारकों द्वारा गढ़े जाते हैं, जबकि कुछ नारे स्वतः जनता के बीच जन्म लेते हैं। ऐसे नारे कई बार इतने लोकप्रिय हो जाते हैं कि वे आंदोलन की पहचान बन जाते हैं। कभी-कभी इन नारों के माध्यम से किसी उत्पाद, ब्रांड या कंपनी का अप्रत्याशित प्रचार भी हो जाता है।
राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान एक नारा खूब प्रचलित हुआ था— “तेल लगाओ डाबर का, नाम मिटाओ बाबर का।” इस नारे का उद्देश्य राजनीतिक-सांस्कृतिक संदेश देना था, लेकिन इसके साथ-साथ “डाबर” नाम भी लाखों लोगों की जुबान पर आ गया। स्वाभाविक रूप से इससे उस ब्रांड को अतिरिक्त पहचान मिली।
इसी प्रकार आपातकाल के बाद के राजनीतिक माहौल में एक नारा सुनाई देता था— “जनता का बिस्कुट पार्ले-जी, इंदिरा गांधी बाय-बाय जी!” यह नारा तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियों का प्रतीक था, किंतु इसके माध्यम से “पार्ले-जी” का नाम भी घर-घर तक पहुँचा। संभवतः उस समय किसी विज्ञापन अभियान से भी अधिक बार यह ब्रांड जनता की जुबान पर आया होगा।
वर्ष 2008 में जब टाटा की बहुप्रतीक्षित नैनो कार परियोजना पश्चिम बंगाल के सिंगूर में विवादों में घिरी, तब आंदोलनकारियों द्वारा “कृषि बचाओ, नैनो भगाओ” का नारा दिया गया। इस आंदोलन का उद्देश्य भूमि अधिग्रहण का विरोध था, लेकिन विडंबना यह रही कि जिस “नैनो” को हटाने का नारा लगाया जा रहा था, उसी “नैनो” का नाम देश ही नहीं बल्कि दुनिया भर में लगातार गूँजता रहा। पश्चिम बंगाल के औद्योगीकरण को इससे झटका लगा, किंतु “नैनो” ब्रांड को जो वैश्विक पहचान मिली, वह किसी भी पारंपरिक विज्ञापन अभियान से कहीं अधिक व्यापक थी।
हाल के दिनों में राजनीतिक व्यंग्य के रूप में प्रचलित “कॉकरोच जनता पार्टी” जैसे संबोधनों ने भी एक नई स्थिति पैदा की है। जब विरोध के स्वर में “कॉकरोच को मिटाना है” जैसे नारे और टिप्पणियाँ सामने आती हैं, तो अनायास ही कॉकरोच मारने वाले उत्पाद “हिट” का नाम भी चर्चा का विषय बन जाता है। सोशल मीडिया से लेकर आम बातचीत तक “हिट” और “कॉकरोच” का यह संबंध बार-बार दोहराया जाता है। यह एक ऐसा उदाहरण है जहाँ राजनीतिक व्यंग्य ने अनजाने में एक व्यावसायिक उत्पाद को अतिरिक्त प्रचार प्रदान कर दिया।
ये उदाहरण बताते हैं कि नारे केवल आंदोलन के संदेशवाहक नहीं होते, बल्कि वे जनसंचार का अत्यंत शक्तिशाली माध्यम भी होते हैं। वे लोगों की स्मृति में लंबे समय तक बने रहते हैं और कभी-कभी अपने मूल उद्देश्य से आगे बढ़कर सामाजिक, सांस्कृतिक और व्यावसायिक प्रभाव भी उत्पन्न कर देते हैं।
इस प्रकार कहा जा सकता है कि किसी भी जन आंदोलन की सफलता में नारों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे जनता को जोड़ते हैं, संदेश को सरल बनाते हैं और आंदोलन को ऊर्जा प्रदान करते हैं। साथ ही, वे कभी-कभी ऐसे अप्रत्याशित परिणाम भी उत्पन्न कर देते हैं, जिनसे किसी उत्पाद, ब्रांड या संस्था को बिना किसी अतिरिक्त प्रयास के व्यापक प्रचार प्राप्त हो जाता है। यही नारों की वास्तविक शक्ति है।