स्वच्छता, वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन और जनभागीदारी ही स्वच्छ व आत्मनिर्भर भारत की मजबूत नींव: त्रिवेन्द्र








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न्यूज 127, देहरादून/ नई दिल्ली।
सांसद हरिद्वार एवं उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत द्वारा लोकसभा में घरेलू कचरे के पृथक्करण, वैज्ञानिक निस्तारण, खाद निर्माण तथा सामुदायिक स्तर पर ठोस एवं प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन को सुदृढ़ करने के संबंध में पूछे गए प्रश्न का केंद्र सरकार ने विस्तृत लिखित उत्तर दिया है।
अपने प्रश्न के माध्यम से त्रिवेंद्र सिंह रावत ने जानना चाहा था कि क्या केंद्र सरकार ग्राम पंचायतों, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशनों (RWA) और आवास समितियों को अपशिष्ट प्रबंधन के लिए वित्तीय सहायता, अनुदान या प्रोत्साहन उपलब्ध करा रही है तथा सामुदायिक स्तर पर ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणालियों के विकास के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं।

आवासन एवं शहरी कार्य राज्य मंत्री तोखन साहू ने अपने लिखित उत्तर में बताया कि स्वच्छ भारत मिशन-शहरी (SBM-U) 2.0 के अंतर्गत राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को उनकी स्वीकृत कार्य योजनाओं के आधार पर केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराई जा रही है, जिसे आगे शहरी स्थानीय निकायों तक पहुंचाया जाता है। वहीं स्वच्छ भारत मिशन-ग्रामीण (SBM-G) के तहत राज्यों को उनकी वार्षिक कार्ययोजना, प्रदर्शन और बजटीय उपलब्धता के आधार पर वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।

सरकार ने यह भी जानकारी दी कि एसबीएम-यू 2.0 के अंतर्गत ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए 10,930.12 करोड़ रुपये का केंद्रीय प्रावधान किया गया है, जिसमें से 10,566.42 करोड़ रुपये की कार्य योजनाओं को स्वीकृति प्रदान की जा चुकी है। इसके अलावा 20 जुलाई 2026 तक देश के 5,36,114 गांवों में ठोस अपशिष्ट प्रबंधन व्यवस्था विकसित की जा चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन को बढ़ावा देने के लिए प्रत्येक विकासखंड में प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन इकाई (PWMU) की स्थापना हेतु अधिकतम 16 लाख रुपये तक की सहायता का भी प्रावधान किया गया है।

इस अवसर पर सांसद त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने कहा कि स्वच्छता केवल अभियान नहीं, बल्कि स्वस्थ समाज, स्वच्छ पर्यावरण और आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था का आधार है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में अपशिष्ट को संसाधन में बदलने की सोच के साथ कार्य किया जा रहा है, जिससे पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ रोजगार और आय के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं।

उन्होंने कहा कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील पर्वतीय राज्य में वैज्ञानिक अपशिष्ट प्रबंधन, कचरे का पृथक्करण, जैविक खाद निर्माण और प्लास्टिक अपशिष्ट का प्रभावी प्रबंधन समय की आवश्यकता है। इससे गांव स्वच्छ होंगे, पर्यावरण सुरक्षित रहेगा और स्थानीय समुदायों को आर्थिक लाभ भी प्राप्त होगा।