ICAR-IIFSR और इक्रीसेट ने शुरू किया लैंडस्केप-आधारित कृषि प्रणाली पर अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण










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पूरे भू-दृश्य (लैंडस्केप) पर आधारित एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता: डॉ. सुनील कुमार

न्यूज 127, मेरठ।
आईसीएआर-भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान, मोदीपुरम ने इंटरनेशनल क्रॉप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर द सेमी-एरिड ट्रॉपिक्स (ICRISAT), हैदराबाद के सहयोग से 1 से 5 सितंबर 2026 तक आयोजित होने वाले पांच दिवसीय अंतरराष्ट्रीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का शुभारंभ किया।

“पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को बढ़ाने के लिए लागत प्रभावी संसाधन संरक्षण उपायों सहित बहु-कार्यात्मक लैंडस्केप-आधारित कृषि प्रणाली का डिजाइन” विषय पर केंद्रित इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन इक्रीसेट के ग्लोबल रिसर्च प्रोग्राम डायरेक्टर डॉ. रमेश सिंह की अध्यक्षता में हुआ।

इस अवसर पर आईसीएआर-आईआईएफएसआर के निदेशक डॉ. सुनील कुमार, एआईसीआरपी-आईएफएस के परियोजना समन्वयक डॉ. एन. रविशंकर और पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. रघुवीर सिंह सहित कई वरिष्ठ वैज्ञानिक मौजूद रहे। देश के 16 राज्यों से आए 27 वैज्ञानिक इस कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे हैं, जो विभिन्न आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विश्वविद्यालयों और एआईसीआरपी-आईएफएस केंद्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रशिक्षण के दौरान कृषि विशेषज्ञों ने वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक और कम लागत वाले समाधानों में बदलने पर जोर दिया।

कृषि प्रणाली संस्थान के निदेशक डॉ. सुनील कुमार ने कहा कि केवल व्यक्तिगत प्रक्षेत्र स्तर के सुधारों के बजाय पूरे भू-दृश्य (लैंडस्केप) पर आधारित एकीकृत दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिससे उत्पादकता और संसाधनों का सही उपयोग बढ़ सके। वहीं डॉ. रमेश सिंह और डॉ. एन. रविशंकर ने जलवायु लचीलेपन (क्लाइमेट रेसिलिएंस), मृदा स्वास्थ्य और पारिस्थितिकी सेवाओं के महत्व को रेखांकित करते हुए प्रक्षेत्र -स्तरीय कार्यों को भू-दृश्य स्तरीय संरक्षण से जोड़ने की बात कही।

इस पांच दिवसीय कार्यक्रम में प्रतिभागियों को व्यावहारिक अभ्यास, डिजिटल कृषि, रिमोट सेंसिंग, वर्षा जल संचयन, लैंडस्केप हाइड्रोलॉजी और क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि का सीधा अनुभव प्रदान किया जा रहा है। कार्यक्रम का संचालन डॉ. राघवेंद्र के. जे. ने किया। यह सत्र वैज्ञानिकों के बीच ज्ञान साझा करने और भविष्य के सहयोग के लिए एक मजबूत मंच तैयार करेगा, जिससे देश भर में अधिक लाभकारी, संसाधन-कुशल और जलवायु-अनुकूल खेती के मॉडल विकसित किए जा सकें।