गुरु कभी सेवानिवृत्त नहीं होते…










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34 साल की कुसुम बाला त्यागी और 26 साल के शरद कांत कपिल की विदाई में छलकीं स्मृतियां, शिक्षक दिवस पर विद्यालय परिवार ने किया नमन

न्यूज 127, हरिद्वार।
कुछ लोग किसी संस्थान में नौकरी नहीं करते, बल्कि अपनी पूरी जिंदगी उस संस्थान की पहचान गढ़ने में लगा देते हैं। उनके जाने के बाद कुर्सियां खाली होती हैं, जिम्मेदारियां दूसरे हाथों में चली जाती हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी से बनी स्मृतियां कभी खाली नहीं होतीं। शिक्षक दिवस पर डीएवी सेन्टेनरी पब्लिक स्कूल, जगजीतपुर में ऐसा ही भावुक अवसर सामने आया, जब विद्यालय परिवार ने अपने दो वरिष्ठ एवं सम्मानित शिक्षकों कुसुम बाला त्यागी और शरद कांत कपिल के दीर्घ एवं समर्पित सेवाकाल को याद किया।

यह केवल दो शिक्षकों की सेवानिवृत्ति को याद करने का अवसर नहीं था, बल्कि उन वर्षों को नमन करने का क्षण था, जिनमें उन्होंने असंख्य विद्यार्थियों को पढ़ाया, उन्हें संस्कार दिए, सहकर्मियों का मार्गदर्शन किया और विद्यालय की शैक्षिक परंपरा को मजबूती प्रदान की।

कक्षा से लेकर प्रशासन तक, हर भूमिका में छोड़ी छाप
कुसुम बाला त्यागी ने हिन्दी शिक्षिका के रूप में 34 वर्षों से अधिक समय तक विद्यालय की सेवा की। प्री-प्राइमरी एवं प्राइमरी विंग की सुपरवाइजरी हेड के रूप में उन्होंने नन्हे विद्यार्थियों से लेकर शिक्षकों तक के बीच अपनी अलग पहचान बनाई। उनकी सबसे बड़ी विशेषता केवल उनका शिक्षकीय ज्ञान नहीं, बल्कि बच्चों के प्रति उनका आत्मीय व्यवहार रहा। छोटे बच्चों के लिए उनका धैर्य, स्नेह और मातृवत अपनापन विद्यालय की स्मृतियों का हिस्सा बन गया। उनके लिए शिक्षा केवल पाठ्यक्रम पूरा करने का माध्यम नहीं थी, बल्कि बच्चे के व्यक्तित्व को आकार देने की प्रक्रिया थी। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच भी उन्होंने अपने सहयोगियों का मार्गदर्शन किया और विद्यालय की शैक्षिक व्यवस्था को बेहतर बनाने में निरंतर योगदान दिया।

शरद कांत कपिल—अर्थशास्त्र के शिक्षक से नेतृत्वकर्ता तक
दूसरी ओर शरद कांत कपिल ने अर्थशास्त्र शिक्षक के रूप में 26 वर्षों से अधिक समय तक विद्यार्थियों का मार्गदर्शन किया। विषय पर उनकी गहरी पकड़ और तार्किक सोच के साथ अनुशासन उनके व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा। सीनियर विंग के सुपरवाइजरी हेड के रूप में उन्होंने विद्यालय की शैक्षिक एवं प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूती देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। विद्यार्थियों के लिए वे विषय के शिक्षक थे तो सहकर्मियों के लिए अनुभव और मार्गदर्शन का स्रोत।
उनके लंबे सेवाकाल में शिक्षा केवल कक्षा की चारदीवारी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने अपने व्यवहार और कार्यशैली से यह संदेश दिया कि एक शिक्षक का प्रभाव उसकी कक्षा से कहीं आगे तक जाता है।

दो नाम, हजारों यादें
किसी शिक्षक की सबसे बड़ी पूंजी क्या होती है? शायद वे विद्यार्थी, जो वर्षों बाद भी अपने शिक्षक को याद करते हैं। वह सम्मान, जो सेवानिवृत्ति के बाद भी कम नहीं होता। और वे स्मृतियां, जो समय बीतने के साथ धुंधली होने के बजाय और गहरी होती जाती हैं। कुसुम बाला त्यागी और शरद कांत कपिल का विद्यालय से रिश्ता भी कुछ ऐसा ही रहा। दोनों के लिए विद्यालय केवल कार्यस्थल नहीं था। यह उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। यहां उन्होंने पीढ़ियां बदलते देखीं, बच्चों को आगे बढ़ते देखा और विद्यालय की विकास यात्रा को करीब से महसूस किया। उनके साथ काम करने वाले शिक्षक और कर्मचारी भी उन्हें केवल सहकर्मी नहीं, बल्कि विद्यालय परिवार के वरिष्ठ सदस्य के रूप में देखते रहे।

विदाई के क्षणों में आंखें नम, दिल में सम्मान
सेवानिवृत्ति जीवन की एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, लेकिन कुछ विदाइयां भावनाओं से भर देती हैं। दोनों शिक्षकों की विदाई भी कुछ ऐसी ही रही। एक ओर इस बात की खुशी थी कि उन्होंने अपने लंबे और गौरवपूर्ण सेवाकाल को सफलतापूर्वक पूरा किया, तो दूसरी ओर यह अहसास भी था कि अब रोजमर्रा की विद्यालयी गतिविधियों में उनकी उपस्थिति नहीं होगी। उनके साथ बिताए वर्षों के संवाद, मार्गदर्शन, अनुभव और छोटी-बड़ी घटनाएं सहकर्मियों की स्मृतियों में ताजा हो उठीं। शायद यही एक शिक्षक की सबसे बड़ी उपलब्धि होती है—वह विद्यालय से विदा होता है, लेकिन विद्यालय की स्मृतियों से कभी विदा नहीं होता।

प्रधानाचार्य ने कहा—सेवानिवृत्ति अंत नहीं, नई शुरुआत है
विद्यालय के प्रधानाचार्य मनोज कुमार कपिल ने दोनों वरिष्ठ शिक्षकों के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उनके दीर्घ एवं समर्पित सेवाकाल के लिए आभार प्रकट किया। उन्होंने कहा कि शिक्षक की वास्तविक उपलब्धि केवल इस बात से तय नहीं होती कि उसने कितने विद्यार्थियों को पढ़ाया, बल्कि इससे होती है कि उसके ज्ञान, व्यवहार और व्यक्तित्व ने कितने जीवनों को प्रभावित किया। प्रधानाचार्य ने कहा कि सेवानिवृत्ति सेवा का अंत नहीं, बल्कि जीवन की एक नई और स्वतंत्र पारी का शुभारंभ है। उन्होंने दोनों शिक्षकों के स्वस्थ, सुखी, सक्रिय एवं आनंदमय जीवन की कामना करते हुए कहा कि उनके द्वारा स्थापित कार्य-संस्कार और उनकी समृद्ध अनुभव-संपदा आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

कैलेंडर बदलता है, गुरु का प्रभाव नहीं
शिक्षक दिवस का यह अवसर एक गहरी बात कह गया—गुरु की भूमिका कभी समाप्त नहीं होती। पद से सेवानिवृत्ति हो सकती है, कक्षा से दूरी हो सकती है, लेकिन जिन विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षक ने ज्ञान और संस्कार के बीज बोए हों, वहां उनका प्रभाव हमेशा बना रहता है। कुसुम बाला त्यागी और शरद कांत कपिल अब विद्यालय की नियमित गतिविधियों का हिस्सा भले न हों, लेकिन उनके 34 और 26 वर्षों के योगदान की कहानी विद्यालय की दीवारों, कक्षाओं और उन विद्यार्थियों की यादों में जीवित रहेगी, जिन्होंने उनसे कुछ सीखा।