न्यूज127, नई दिल्ली
पावन चिंतन धारा आश्रम, गाजियाबाद के तत्वावधान में परम पूज्य डॉ. पवन सिन्हा गुरुजी के सान्निध्य में श्रीकृष्ण भक्ति संध्या का भव्य एवं आध्यात्मिक आयोजन कॉन्स्टिटूशन क्लब, नई दिल्ली में किया गया। कार्यक्रम में देशभर से आए श्रद्धालुओं, विद्वानों और गणमान्य अतिथियों की गरिमामयी उपस्थिति ने इसे एक दिव्य आयाम प्रदान किया।

कार्यक्रम का शुभारंभ वैदिक मंत्रोच्चार और भक्ति संगीत के साथ हुआ, जिसके पश्चात आश्रम की परम पूज्य गुरु माँ डॉ. कविता अस्थाना ने अपने उद्बोधन में कहा कि आश्रम का उद्देश्य केवल सन्यास नहीं, बल्कि वैराग्य के माध्यम से जीवन के कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए ईश्वर से जुड़ना है। उन्होंने कहा कि सेवा ही मोक्ष का मार्ग है और भक्ति तथा ज्ञान का संतुलित समन्वय ही सच्चे धर्म की पहचान है। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से अपने धर्म के वास्तविक स्वरूप को समझने और जीवन में उतारने का आह्वान किया।

व्यासपीठ पर विराजमान महिमा वाचक सुरभि दीदी ने कृष्ण के जीवन के जन्म से लेकर महाप्रस्थान तक के गूढ़, सूक्ष्म और प्रेरणादायक प्रसंगों को अत्यंत भावपूर्ण शैली में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि “कृष्ण केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक गुण हैं। वे महान योगेश्वर, वेदों के ज्ञाता और उच्च कोटि के विद्वान हैं। यदि उनके गुणों का एक अंश भी हम अपने जीवन में उतार लें, तो जीवन सार्थक हो सकता है।”

सुरभि दीदी ने भगवद्गीता के प्रसिद्ध श्लोक “उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्…” का उल्लेख करते हुए कहा कि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र और शत्रु होता है। उन्होंने बताया कि व्यक्ति अपने कर्मों से ही सुख और दुख का निर्माण करता है, इसलिए कर्म सदैव कल्याणकारी और धर्मसम्मत होने चाहिए।

उन्होंने चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख करते हुए सच्ची भक्ति की व्याख्या की और कहा कि भक्ति प्रेम की वह चरम अवस्था है, जहां भक्त और भगवान में कोई अंतर नहीं रह जाता। उन्होंने यह भी कहा कि “कृष्ण जैसी उच्च कोटि की संतान प्राप्त करने के लिए माता-पिता को भी तप, शुद्धता और आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलना होगा।”
अपने प्रवचन में उन्होंने कृष्ण के जीवन के अनेक मार्मिक प्रसंगों का उल्लेख किया—जन्म के समय की कठिन परिस्थितियां, बाल्यकाल की लीलाएं, शिक्षा-दीक्षा, सुदामा के साथ उनकी अद्वितीय मित्रता, महाभारत युद्ध में उनका योगदान और अंत समय की पीड़ा। इन प्रसंगों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भाव-विभोर कर दिया।

सुरभि दीदी ने यह भी बताया कि कृष्ण ने 16 हजार स्त्रियों को सम्मान और संरक्षण प्रदान किया, किंतु समाज ने उनके इस दिव्य कार्य को गलत रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कृष्ण के जीवन के अंतिम क्षणों का अत्यंत संवेदनशील वर्णन करते हुए बताया कि महान विभूतियां अक्सर अंत में अकेली रह जाती हैं। यदुवंश के विनाश और गांधारी के श्राप का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि स्वयं ईश्वर भी प्रकृति के नियमों के विरुद्ध नहीं जाते।
उन्होंने राष्ट्रधर्म को सर्वोपरि बताते हुए कहा कि “सच्चा कृष्ण भक्त वही है, जो राष्ट्रभक्त भी हो। हमें अपने राष्ट्र को पुनः विश्वगुरु बनाने का संकल्प लेना होगा।” उन्होंने सभी श्रद्धालुओं से पंच विकारों—काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार—से दूर रहने और कृष्ण के आदर्शों पर चलने का आह्वान किया।
कार्यक्रम के दौरान आश्रम की सुर साधक मंडली—डॉ. संजय अन्डूरकर, सुश्री ख्याति, करण मल्होत्रा, आस्तिक सिन्हा अस्थाना, प्रेषा रावत एवं सचिन—द्वारा प्रस्तुत मधुर भजनों ने पूरे सभागार को कृष्णमय बना दिया। श्रद्धालु भक्ति में डूबकर झूम उठे।
इस अवसर पर मुख्य अतिथियों एवं विशिष्ट अतिथियों के रूप में माननीय जस्टिस (सेवानिवृत्त) शम्भु नाथ श्रीवास्तव, प्रख्यात लेखक एवं कवि आलोक श्रीवास्तव, विजय भैया, प्रो. चाँद किरण सलूजा, प्रो. गौरव राव, राजेश चेतन, सलिल बिश्नोई (पूर्व विधायक, कानपुर), सचिन त्यागी, प्रो. ज्योति शर्मा (दिल्ली विश्वविद्यालय), डॉ. ऋषभ मिश्रा (अम्बेडकर विश्वविद्यालय), राजन चिब्बर, एन.आर. जैन, शेखर गुप्ता, जितेंद्र तिवारी, प्रदीप शर्मा, राजेश बंसल, अजय कपूर, हरेंद्र तोमर, सुनील अग्रवाल एवं हिम्मत सिंह नेगी सहित अनेक गणमान्य व्यक्ति उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के समापन पर सभी श्रद्धालुओं ने कृष्ण के दिखाए मार्ग पर चलने, अपने जीवन में उनके गुणों को आत्मसात करने तथा राष्ट्रहित में कार्य करने का सामूहिक संकल्प लिया। यह भक्ति संध्या न केवल आध्यात्मिक जागरण का माध्यम बनी, बल्कि जीवन को सकारात्मक दिशा देने वाली प्रेरणा भी प्रदान कर गई।




