न्यूज 127, हरिद्वार।
सनातन परंपरा और शास्त्रों की प्रामाणिकता के संरक्षण के लिए हरिद्वार के पतंजलि विश्वविद्यालय में आयोजित अखिल भारतीय प्राच्य विद्या महासम्मेलन के दूसरे दिन एक बड़ा निर्णय लिया गया। जगद्गुरु शंकराचार्यों, अखिल भारतीय संत समिति, विभिन्न अखाड़ों, गुरु-परंपराओं के संतों तथा आरएसएस व विहिप के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में सर्वसम्मति से ‘सनातन शास्त्र शुद्धिकरण समिति’ के गठन का प्रस्ताव पारित किया गया।
इस पहल के तहत एक उच्चस्तरीय विद्वत परिषद का गठन किया गया है, जिसमें आचार्यों और शास्त्रों के जानकारों को शामिल किया गया है। यह परिषद शास्त्रों में समय-समय पर हुई मिलावट और विकृतियों का अध्ययन कर संत-संन्यासी परिषद को रिपोर्ट सौंपेगी, जिसका परीक्षण मार्गदर्शक मंडल करेगा। संत-संन्यासी परिषद के संयोजक की जिम्मेदारी स्वामी परमात्मानंद और विद्वत परिषद के संयोजक की जिम्मेदारी प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी को सौंपी गई है। सम्मेलन के दौरान योगगुरु स्वामी रामदेव और आचार्य बालकृष्ण द्वारा लिखित वैज्ञानिक ग्रंथ “वैदिक आख्यान विज्ञान” का विमोचन भी किया गया।
सम्मेलन को संबोधित करते हुए योगऋषि स्वामी रामदेव ने कहा कि पिछले कुछ वर्षों में कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा एआई टूल्स का दुरुपयोग कर हमारे देवी-देवताओं और शास्त्रों के बारे में भ्रामक व मिथ्या आरोप लगाए जा रहे हैं। उन्होंने वेद विरुद्ध आचरण करने वालों के पूर्ण सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार का आह्वान किया। आचार्य बालकृष्ण ने कहा कि षड्यंत्रपूर्वक विकृत किए गए भारतीय इतिहास का सनातन की दृष्टि से पुनर्लेखन का कार्य पतंजलि योगपीठ में चल रहा है।
कार्सिणी पीठाधीश्वर स्वामी गुरु शरणानंद जी महाराज, मलूक पीठाधीश्वर स्वामी राजेंद्र दास जी महाराज, जूनापीठाधीश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि जी महाराज, शंकराचार्य स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती सहित देश के तमाम शीर्ष संतों, धर्माचार्यों और वक्ताओं ने इस अभियान को वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता बताते हुए अपना पूर्ण समर्थन दिया। वक्ताओं ने कहा कि डिजिटल युग में सनातन शास्त्रों की शुद्धि और उनकी वैज्ञानिकता का प्रचार-प्रसार समय की मांग है, ताकि युवा पीढ़ी को सही और प्रामाणिक ज्ञान मिल सके।
इस कार्यक्रम में आचार्य वीरनारायण पांडुरंगी, अध्यक्ष, भारतीय विद्वत परिषत, गणेश उमाकांत थीटे, प्रो. शिवानी, संयुक्त सचिव, एआईओसी तथा 23 विश्वविद्यालयों के कुलपति, पतंजलि ग्रामोद्योग से डॉ. यशदेव शास्त्री, पतंजलि विश्वविद्यालय की प्रति-कुलपति साध्वी डॉ. देवप्रिया जी, पतंजलि परिवार के वरिष्ठ सदस्यगण, संन्यासी भाई, संन्यासिनी बहनें, समस्त ईकाई प्रमुख, विभागाध्यक्ष, कर्मयोगीगण, पतंजलि विश्वविद्यालय के प्राचार्यगण तथा विद्यार्थीगण उपस्थित रहे।
सम्मेलन में संतों, पीठाधीशों, धर्माधीशों तथा महामण्डलेश्वरों में अनंत श्री विभूषित कैवलज्ञानपीठाधीश्वर जगद्गुरु श्री अविचलदेवाचार्य महाराजश्री, श्री पंचायती अखाड़ा निर्मल के प्रमुख, श्री ज्ञानदेव सिंह जी महाराज, महामंडलेश्वर गीता मनीषी स्वामी श्री ज्ञानानंद जी महाराज, स्वामीनारायण संस्थान (BAPS) के स्वामी भद्रेशदास जी महाराज, विश्व जागृति मिशन के संस्थापक अध्यक्ष सुधांशु जी महाराज, आचार्य श्री पुण्डरीक गोस्वामी जी, वाराणसी के जगतगुरु श्री सतुआ बाबा (संतोष दास जी महाराज), स्वामी प्रेम विवेकानंद जी महाराज (साधना केंद्र आश्रम, डुमेट के संस्थागत प्रमुख), पेजावर मठ, उडुपी के स्वामी विश्वप्रसन्न तीर्थ जी, इस्कॉन के गौरांग दास प्रभु, रामकृष्ण मठ से पूज्य स्वामी आत्मप्रियानंद जी, अद्वैत आश्रम के स्वामी चिदानंद पुरी, आर्य समाज, हरियाणा से पूज्य स्वामी आर्यवेश जी, राष्ट्र सेविका समिति से बहन शांताकुमारी, श्री आदिचुंचनगिरि महासंस्थान मठ के स्वामी निर्मलानंद गिरि महास्वामी जी, स्वामी नारायण-वडताल धाम के स्वामी माधवप्रिय दास जी महाराज, सिद्ध पीठ भूमानिकेतन आश्रम के अनंत श्री विभूषित स्वामी अच्युतानंद तीर्थ जी महाराज, श्री गुरुमंडल आश्रम के महामंडलेश्वर भगवत स्वरूप जी महाराज, निर्मल अखाड़ा के स्वामी ज्ञानदेव सिंह जी, मथुरा से आचार्य स्वदेश जी, कुरुक्षेत्र से स्वामी संपूर्णानंद जी, आर्य समाज दिल्ली से आदरणीय विनय आर्य जी ने स्वयं उपस्थित रहकर वेद शास्त्रों में शुद्धिकरण का समर्थन किया।
पालीमारु मठ-उडुपी से स्वामी विद्याधीश तीर्थ जी के प्रतिनिधि – डॉ. वंशी कृष्ण, व्यासराज मठ, मैसूरु के स्वामी विद्याश्रीश तीर्थ जी के प्रतिनिधि – डॉ. डी.पी. अनंत, कांची कामकोटि मठ-कांचीपुरम से स्वामी विजयेंद्र सरस्वती के प्रतिनिधि – प्रो. कुटुंब शास्त्री, उत्तरादि मठ-बेंगलुरु से श्री सत्यात्मतीर्थ स्वामी जी के प्रतिनिधि – डॉ. सत्यध्यान कट्टी, द्वारका से स्वामी सदानंद सरस्वती जी, सुत्तूर मठ-मैसूरु से श्री शिवरात्रि देशिकेंद्र महास्वामी जी, श्रृंगेरी शारदा पीठ के स्वामी विधुशेखर तीर्थ जी तथा पुरी से स्वामी निश्चलानंद सरस्वती जी के प्रतिनिधियों ने सम्मेलन में भाग लिया।
पुत्तिगे मठ-उडुपी के स्वामी सुगुणेंद्र तीर्थ जी, महंत हनुमत पीठ अयोध्या से आचार्य मिथिलेश नंदिनी शरण आदि ने दूरभाष के माध्यम से अपना समर्थन दिया।
सनातन शास्त्र विमर्श में विशेषज्ञों के रूप में बेंगलुरु से रामचंद्र जी. भट, पूर्णप्रज्ञा विद्यापीठ बेंगलुरु से प्रो. ए. हरिदास भट्ट जी, हैदराबाद से आचार्य आनंद प्रकाश जी, वाराणसी से प्रो. ब्रजभूषण ओझा (काशी हिंदू विश्वविद्यालय), राष्ट्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय तिरुपति से प्रो. नारायण एम., हेमवती नंदन बहुगुणा विश्वविद्यालय-श्रीनगर से डॉ. विश्वेश ‘वाग्मी’, प्रो. विजय पाल शास्त्री, श्री व्यासतीर्थ संशोधन प्रतिष्ठानम्, बेंगलुरु के निदेशक डॉ. ए. वी. नागसंपिगे, प्रो. ओम नाथ बिमली, उत्तराखंड संस्कृत अकादमी के सचिव डॉ. विनय विद्यालंकार, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय देवप्रयाग के प्रो. पी. वी.बी. सुब्रह्मण्यम, दिल्ली से प्रो. एस.के. सेनापति, केरल से प्रो. विजयकुमार मेनन, आचार्य रामेश्वर पंकज मिश्र जी, आचार्य कुसुमलता केड़िया जी, वेद-विज्ञान शोध संस्थानम्-बेंगलुरु के निदेशक प्रो. महाबलेश्वर भट, भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रभाग (शिक्षा मंत्रालय, नई दिल्ली) से डॉ. गांति मूर्ति, डॉ. संध्या पुरेचा, प्राच्य अनुसंधान संस्थान (ओआरआई), मैसूर विश्वविद्यालय के निदेशक डॉ. पी. मधुसूदन, श्रीमद् दयानंद कन्या गुरुकुल-रोहतक से डॉ. सुकमा जी आदि लगभग 40 विद्वानों से सनातन शास्त्र विमर्श विषय पर ज्ञान मंथन किया।


