DPS में दिखा भारत का सांस्कृतिक वैभव, नन्हे कलाकारों ने मंच पर साकार की ‘भारत माता’










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स्वर्णिम 50 वर्षों की शैक्षणिक यात्रा के जश्न में भारतीय संस्कृति और संस्कारों का अद्भुत संगम

न्यूज 127, नवीन चौहान।
दिल्ली पब्लिक स्कूल (डीपीएस) रानीपुर की गौरवशाली 50 वर्षों की शैक्षणिक यात्रा के उपलक्ष्य में आयोजित भव्य समारोह में भारतीय संस्कृति, परंपरा और संस्कारों का ऐसा अद्भुत संगम देखने को मिला कि पूरा विद्यालय परिसर मानो लघु भारत में तब्दील हो गया। स्कूली बच्चों ने देश के अलग-अलग राज्यों की संस्कृति, लोक परंपराओं, वेशभूषा, नृत्य और संगीत को मंच पर जीवंत करते हुए उपस्थित दर्शकों को भारत की विविधता में छिपी एकता का एहसास कराया।

समारोह की सांस्कृतिक प्रस्तुतियों में भारत के विभिन्न अंचलों की झलक एक साथ दिखाई दी। कहीं लोक संस्कृति की जीवंतता नजर आई तो कहीं शास्त्रीय नृत्य की गरिमा ने वातावरण को आध्यात्मिक रंग दिया। रंग-बिरंगी पारंपरिक वेशभूषा में सजे विद्यार्थियों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से यह संदेश दिया कि भारत की असली शक्ति उसकी विविध सांस्कृतिक विरासत और संस्कारों में निहित है।

एक मंच पर सिमटा पूरा भारत
कार्यक्रम का सबसे आकर्षक पक्ष यह रहा कि विद्यार्थियों ने भारत के विभिन्न राज्यों की संस्कृति को एक मंच पर समेटकर भारत माता का सांस्कृतिक स्वरूप प्रस्तुत किया। उत्तर से दक्षिण और पूरब से पश्चिम तक भारत की विविध लोक परंपराओं की झलक प्रस्तुतियों में देखने को मिली। अलग-अलग भाषाओं, लोकधुनों, नृत्य शैलियों और परिधानों के माध्यम से विद्यार्थियों ने देश की सांस्कृतिक एकता का संदेश दिया। मंच पर जब विभिन्न राज्यों की लोक संस्कृतियां एक साथ जीवंत हुईं तो ऐसा लगा मानो पूरा भारत अपनी विविधताओं के साथ एक ही स्थान पर उपस्थित हो। दर्शकों ने तालियों की गड़गड़ाहट से बच्चों का उत्साह बढ़ाया और उनकी प्रस्तुतियों की जमकर सराहना की।

संस्कृति के साथ संस्कारों की भी दी सीख
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां केवल मनोरंजन तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि इनके माध्यम से भारतीय संस्कारों, पारिवारिक मूल्यों, गुरु-शिष्य परंपरा, मातृभूमि के प्रति सम्मान, भाईचारे और सामाजिक समरसता का संदेश भी दिया गया। बच्चों ने अपनी प्रस्तुतियों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया कि आधुनिक शिक्षा के साथ अपनी जड़ों और सांस्कृतिक विरासत से जुड़े रहना भी उतना ही आवश्यक है। विद्यार्थियों के अभिनय, नृत्य, संगीत और भावाभिव्यक्ति में जिस आत्मविश्वास और अनुशासन का परिचय मिला, उसने विद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था के साथ-साथ उसके संस्कार आधारित वातावरण की भी झलक प्रस्तुत की।

‘अनेकता में एकता’ बनी प्रस्तुतियों की आत्मा
कार्यक्रम में प्रस्तुत विभिन्न सांस्कृतिक रंगों की मूल भावना ‘अनेकता में एकता’ रही। अलग-अलग प्रदेशों की संस्कृति को एक मंच पर प्रस्तुत कर विद्यार्थियों ने यह संदेश दिया कि भाषा, पहनावे, खान-पान और लोक परंपराओं में भले ही विविधता हो, लेकिन भारत की आत्मा एक है। नन्हे कलाकारों से लेकर वरिष्ठ विद्यार्थियों तक ने अपनी प्रस्तुतियों में जिस समर्पण और उत्साह का परिचय दिया, वह दर्शनीय रहा। मंच पर बच्चों की कदमताल, भावपूर्ण अभिनय और पारंपरिक संगीत की धुनों ने वातावरण को पूरी तरह भारतीय रंग में रंग दिया।

पांच दशकों की विरासत का सांस्कृतिक उत्सव
डीपीएस रानीपुर के 50 वर्षों के सफर का यह समारोह केवल विद्यालय की शैक्षणिक उपलब्धियों का उत्सव नहीं, बल्कि उसकी सांस्कृतिक विरासत और संस्कारों का भी उत्सव बन गया। पांच दशकों में विद्यालय ने शिक्षा के क्षेत्र में अपनी अलग पहचान स्थापित करने के साथ विद्यार्थियों को भारतीय मूल्यों, संस्कृति और परंपराओं से जोड़ने की दिशा में भी निरंतर प्रयास किया है। समारोह में बच्चों की प्रस्तुतियों ने यह साबित किया कि शिक्षा का उद्देश्य केवल पुस्तकीय ज्ञान देना नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्व का निर्माण करना भी है जो अपनी संस्कृति, देश और समाज के प्रति जिम्मेदारी को समझे।

बच्चों की प्रतिभा ने जीता दर्शकों का दिल
सांस्कृतिक कार्यक्रमों के दौरान विद्यार्थियों की प्रस्तुतियों को देखकर उपस्थित अभिभावक, अतिथि और शिक्षक भावविभोर नजर आए। बच्चों की मेहनत, आत्मविश्वास और मंचीय प्रस्तुति ने समारोह को यादगार बना दिया। डीपीएस रानीपुर के स्वर्ण जयंती वर्ष का यह आयोजन इस अर्थ में भी विशेष रहा कि इसमें नई पीढ़ी ने अपनी जड़ों से जुड़कर भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को मंच पर उतारा। विद्यार्थियों ने अपनी कला के माध्यम से न केवल दर्शकों का मनोरंजन किया, बल्कि भारतीय संस्कृति की उस मूल भावना को भी सामने रखा, जो सदियों से देश को एक सूत्र में बांधे हुए है।

स्वर्ण जयंती समारोह में प्रस्तुत सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने स्पष्ट कर दिया कि डीपीएस रानीपुर की 50 वर्षों की यात्रा केवल शिक्षा और उपलब्धियों की यात्रा नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कार, संस्कृति और राष्ट्रभावना को साथ लेकर आगे बढ़ने की स्वर्णिम परंपरा भी है।