कांग्रेसियों ने लांघ दी लोकतंत्र की मर्यादा, गरिमा बनाम गाली गलौज








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नैनीताल के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्यालय में हालिया घटनाक्रम ने एक बार फिर लोकतंत्र में विरोध की सीमाओं और मर्यादाओं पर गंभीर बहस छेड़ दी है। धरना-प्रदर्शन के दौरान कांग्रेसियों के द्वारा कथित अभद्र भाषा और असम्मानजनक व्यवहार के खिलाफ जिस तरह उत्तराखंड के आईपीएस, पीपीएस (सेवानिवृत्त) और पीपीएस एसोसिएशनों ने एक स्वर में प्रतिक्रिया दी है, वह केवल एक घटना की निंदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक गरिमा और लोकतांत्रिक अनुशासन की रक्षा का संदेश भी है।

लोकतंत्र में असहमति और विरोध न केवल अधिकार हैं, बल्कि व्यवस्था को संतुलित रखने के आवश्यक उपकरण भी हैं। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि अधिकारों के साथ जिम्मेदारियां और मर्यादाएं जुड़ी होती हैं। जब विरोध अपनी सीमाएं लांघकर व्यक्तिगत आक्षेप, गाली-गलौज या संस्थानों की गरिमा को ठेस पहुंचाने लगे, तब वह लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति न रहकर अराजकता का रूप ले लेता है।

नैनीताल की घटना इसी चिंता को रेखांकित करती है। एक संवेदनशील पद पर कार्यरत अधिकारी, जो कानून-व्यवस्था और नागरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी निभाता है, उसके साथ अभद्र व्यवहार न केवल व्यक्तिगत अपमान है, बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास का संकेत भी देता है। यदि इस तरह की प्रवृत्तियों को समय रहते रोका नहीं गया, तो इसका असर पुलिस बल के मनोबल और शासन व्यवस्था की प्रभावशीलता पर पड़ना तय है।

तीनों एसोसिएशनों की प्रतिक्रिया इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह किसी एक व्यक्ति के पक्ष में नहीं, बल्कि संस्थागत सम्मान और सेवा की गरिमा के पक्ष में है। यह संदेश स्पष्ट है कि लोकतंत्र में विरोध का अधिकार असीमित नहीं है; उसे संविधान, कानून और सामाजिक शिष्टाचार की सीमाओं में रहकर ही व्यक्त किया जाना चाहिए।

आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीतिक दल, जनप्रतिनिधि और आम नागरिक—सभी इस अंतर को समझें कि सशक्त विरोध और असम्मानजनक व्यवहार में एक महीन लेकिन निर्णायक रेखा होती है। उस रेखा को पार करना न केवल व्यवस्था को कमजोर करता है, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों को भी क्षति पहुंचाता है।

लोकतंत्र की मजबूती केवल अधिकारों के प्रयोग से नहीं, बल्कि मर्यादाओं के पालन से सुनिश्चित होती है। नैनीताल की घटना एक चेतावनी है कि यदि संवाद की भाषा संयमित नहीं रही, तो लोकतांत्रिक विमर्श का स्तर गिरता जाएगा। समय की मांग है कि विरोध भी हो—पर सम्मान के साथ, मर्यादा के साथ।